प्रशांत किशोर बिहार का राजनीतिक विकल्प क्यों नहीं बन सकते?

 

 

 

प्रशांत किशोर बिहार का राजनीतिक विकल्प क्यों नहीं बन सकते?

 

बिहार की राजनीति में इस समय एक बहुत बड़ा गैप है। इस गैप को भरने की जरूरत है। लेकिन सवाल यह है कि इसे भरेगा कौन?

 

NDA अपना वोट बैंक गंवाने की तैयारी में बैठा है, बस कोई उसे लपकने वाला चाहिए। RJD गर्त में जाने को तैयार है, बस आखिरी हथौड़ा मारने की जरूरत है।

 

मैं यह बात क्यों कह रहा हूं, इसे समझिए।

 

बिहार की जनता अब सिर्फ मस्जिद-मंदिर, भगवा-हरा में फंसने वाली नहीं है। जनता खुलकर अपनी समस्याओं का समाधान मांग रही है। एक ही एजेंडे पर लोगों को कब तक मूर्ख बनाते रहोगे?

 

इसी बदलाव का नतीजा है कि CJP आंदोलन जैसे मुद्दे सामने आते हैं और बांकीपुर जैसी विधानसभा सीट पर भी स्थापित राजनीतिक समीकरण टूटते हैं।

 

तेजस्वी यादव हर महत्वपूर्ण मौके पर गायब रहते हैं। धीरे-धीरे उनकी छवि एक नॉन-सिरियस पॉलिटिशियन की बनती जा रही है। लालू यादव का समाजवाद अब पूरी तरह परिवारवाद में बदल चुका है। यह बात अब उनका MY वोट बैंक भी समझने लगा है। खासकर वह युवा, जो समाजवाद की राजनीति में अपनी पहचान बनाना चाहता है।

 

अब सवाल आता है कि क्या इस खाली जगह को प्रशांत किशोर भर सकते हैं?

मेरा जवाब है, नहीं।

 

और इसका कारण बहुत साफ है।

 

प्रशांत किशोर विपक्ष का राजनीतिक विकल्प इसलिए नहीं बन सकते, क्योंकि उनकी राजनीति में सोशल जस्टिस दिखाई नहीं देता।

 

मैंने उन्हें असमानता के खिलाफ उतनी मजबूती से बोलते नहीं देखा। सामंतवाद के खिलाफ उनकी राजनीति का कोई स्पष्ट एजेंडा नहीं दिखता। समाज के हर वर्ग को बराबर की हिस्सेदारी देने की बात उनकी राजनीति के केंद्र में नहीं है।

 

सिर्फ बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा की बात करना पर्याप्त नहीं है।

 

बिहार में अब वह राजनीतिक विकल्प स्वीकार होगा जो यह कहेगा कि सत्ता और व्यवस्था में हर वर्ग की बराबर हिस्सेदारी होनी चाहिए।

 

जो कहेगा कि मजदूरों को सम्मानजनक दिहाड़ी मिले।

जो कहेगा कि वर्करों के अधिकार सुरक्षित हों।

जो लेबर लॉ को मजबूती से लागू करने की बात करेगा।

जो बेरोजगारी को सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती मानेगा।

जो अफसरशाही के खिलाफ खड़ा होगा।

 

जो जाति और धर्म के नाम पर समाज को बांटने के बजाय समानता, सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी की बात करेगा।

 

बिहार में जाति की राजनीति अभी खत्म नहीं हुई है। रीलबाज नेता और कुछ कथित सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर लगातार बिहार को उसी गर्त में धकेल रहे हैं।

 

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।

 

बुद्धिजीवी युवाओं का एक बड़ा वर्ग सामने आ रहा है। यह वर्ग जाति-धर्म से ऊपर उठकर मुद्दों की बात करना चाहता है। यह वर्ग असली समाजवाद की बात कर रहा है। सामाजिक न्याय की बात कर रहा है। बराबरी की बात कर रहा है।

 

और यहीं प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी सामने आती है।

 

बिहार सिर्फ विकास का मॉडल नहीं मांग रहा। बिहार एक न्यायपूर्ण राजनीतिक मॉडल मांग रहा है।

 

जिस दिन कोई नेता यह भरोसा पैदा कर देगा कि वह सिर्फ सरकार नहीं बनाएगा, बल्कि व्यवस्था में हर वर्ग की हिस्सेदारी सुनिश्चित करेगा उस दिन बिहार की राजनीति बदल जाएगी।

 

इसलिए सवाल यह नहीं है कि प्रशांत किशोर NDA और RJD का विकल्प बन सकते हैं या नहीं।

 

सवाल यह है कि क्या प्रशांत किशोर की राजनीति उस सामाजिक न्याय की खाली जगह को भर सकती है, जिसकी बिहार को आज सबसे ज्यादा जरूरत है?

 

मेरे हिसाब से नहीं।

 

बिहार का अगला राजनीतिक विकल्प वही होगा, जो समानता + सामाजिक न्याय + रोजगार + हिस्सेदारी + जवाबदेह शासन की राजनीति करेगा।

 

बाकी सब सिर्फ नैरेटिव है।

 

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